
द्वितीय संस्करण सर्वप्रिय प्रकाशन, नयी दिल्ली: 2026
साहित्य समाज का दर्पण है, जो जन-जीवन की समग्रता को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। छत्तीसगढ़ी साहित्य की बात करें तो, इसने लोक परंपरा और लोकजीवन को अपनी रचनाधर्मिता में संजोकर विशिष्ट पहचान बनाई है। छत्तीसगढ़ की लोकआषा, लोकनृत्य, लोककला, लोकगीत, रीति-रिवाज, मुहावरे और लोकोक्तियां यहां की सांस्कृतिक अस्मिता के जीवंत प्रमाण हैं। इसी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाती एक कालजयी कृति है ‘गुड़ी के गोठ’।
छत्तीसगढ़ी गद्य के युग प्रवर्तक, लोकविद्, आध्यात्मविद् एवं शिक्षाविद् डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा द्वारा रचित यह कृति केवल पुस्तक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोक की संग्रहीत भाषा है।
शीर्षक की सार्थकताः ‘गुड़ी’ लोकतंत्र की प्रथम चौपाल
‘गुड़ी के गोठ’ का शीर्षक ही इसकी आत्मा को उद्घाटित करता है। ‘गुड़ी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में वह पवित्र-सामाजिक स्थल है, जहां ग्रामवासी एकत्र होकर सुख-दुख, न्याय-अन्याय और नीति-अनीति पर विमर्श करते हैं। कई गांवों में गुड़ी ही न्याय-निर्णय का केन्द्र रही है।
समीक्षक का यह अनुभव मार्मिक है कि बिलासपुर से मात्र 65 किलोमीटर दूर अपने ही गांव में ‘गुड़ी’ शब्द से अपरिचित होना, भाषा की स्थानिक विविधता ‘कोस-कोस में पानी बदले, चार कोस में बानी को रेखांकित करता है। लेखक ने इस भूली-बिसरी संस्था को पुनर्जीवित कर ग्रामीण लोकतंत्र की जड़ों से वर्तमान पीढ़ी को जोड़ने का स्तुत्य प्रयास किया है।
विषय वस्तुः वेद से डिजिटल युग तक, गांव से वैश्विकता तक
गुड़ी के गोठ ग्रामीण जनजीवन की विविध अनुभूतियों का विश्वकोश है। इसमें छत्तीसगढ़ी समाज की समस्याएं, संघर्ष, रिश्ते, संस्कृति और जीवन-दर्शन का मार्मिक चित्रण है।
डॉ० शर्मा की दृष्टि केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति है -सामाजिक चेतना और समाधानमूलक दृष्टि
लेखक कबड्डी की महत्ता से लेकर शराबखोरी के दुष्परिणाम, राजनीतिक स्वार्थ से लेकर मिलावट की समस्या, किसानों के संकट से लेकर अरपा नदी के सांस्कृतिक महत्व तक हर विषय को गंभीरता से उठाते हैं। वे ‘तीजन बाई के योगदान’, ‘कबीर के दोहों की प्रासंगिकता और ऋषि संस्कृति से अरण्य संस्कृति तक की यात्रा को जोड़कर छत्तीसगढ़ को भारत की आत्मा से संबद्ध कर देते हैं।
भाषा-शैली: ठेठपन में बसी रसधारा
कृति की भाषा छत्तीसगढ़ी है सरल, सहज, प्रवहमान, किन्तु ठेठपन के माधुर्य से संपृक्त। स्थानीय शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग भाषा को जीवंत बनाता है। गद्य और पद्म की सरसता का अद्भुत समायोजन, हास्य-व्यंग्य का संयमित प्रयोग और छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से रचा गया संवाद पाठक को ‘गुड़ी’ में बैठे होने का अनुभव कराता है।
डॉ० शर्मा केवल शिक्षक नहीं, शिक्षावान’ होने पर बल देते हैं क्योंकि शिक्षावान व्यक्ति ही सामाजिक एकता, नैतिक मूल्य और पारिवारिक सद्भाव का वाहक बनता है।
अस्मिता का संरक्षण और पोषण का बचाव
डॉ० शर्मा प्रत्यक्ष काल से संवाद करते हुए कालजयी कृति में वर्तमान समय में छत्तीसगढी अस्मिता के विखंडन पर गहरी चिंता व्यक्त करते है। लेखक की स्पष्ट अवधारणा है कि “अपनी संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व को बचाना है तो मातृभाषा और मातृभूमि से प्रेम करना होगा। इसके लिए धरती को जन्म भूमि, कर्मभूमि और मरणभूमि के रूप में स्वीकारना होगा।”
डॉ० शर्मा अंधविश्वास, भेदभाव, रूढ़िवादिता पर कुठाराघात करते हुए शिक्षा, अन्नदान-गोदान से बढ़कर शिक्षादान’ पर बल देते हैं। प्रेम, करूणा, सहानुभूति, त्याग और सहयोग जैसे मानवीय मूल्यों को ग्रामीण संबंधों की रीढ़ बताते हैं।
साहित्यिक महत्वः भविष्य का मील का पत्थर
गुड़ी के गोठ यथार्थवाद, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं इसमें ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और समसामयिक विमर्श का उत्कृष्ट समन्वय है। यह कृति नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने सेतु का काम करेगी। जिस प्रकार बड़े निर्णय सुसज्जित कार्यालयों में होते हैं, उसी प्रकार भारत के 70 प्रतिशत ग्रामीण जन का ‘कार्यालय उसकी गुड़ी है यह सत्य स्थापित कर डॉ० शर्मा ने लोक को साहित्य के केन्द्र में प्रतिष्ठित किया है।
समाज का दर्पण, संस्कृति का दस्तावेज
गुड़ी के गोठ’ केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी समाज, भाषा, संस्कृति और परंपराओं का बहुमूल्य दस्तावेज है। इसमें कबड्डी से लेकर कबीर तक, अरपा से लेकर अरण्य संस्कृति तक, तीजन बाई से लेकर शिक्षादान तक समूचा छत्तीसगढ़ सांस लेता है।
प्रख्यात भाषाविद् बहुआषी वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० चित्तरंजन कर के शब्दों को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा इस कृति में डॉ० पालेश्वर प्रसाद शर्मा ने काल से प्रत्यक्ष संवाद किया है, जिसमें प्रकृति-मनुष्य, मनुष्य-मनुष्येतर एवं मनुष्य-मनुष्य में समरसता है, जो गद्य में कविता की सरसता का आस्वाद लिए हुए है।
सारतः यह ‘कालजयी कृति छत्तीसगढ़ी संस्कृति का कालपात्र है, जिसमें हमारी सनातन परंपरा का यशोगान है।
गुड़ी के गोठ’ भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक, उपयोगी एवं मार्गदर्शक सिद्ध होगी। निःसंदेह, डॉ० पालेश्वर प्रसाद शर्मा की यह कालजयी रचना छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध करते हुए ‘काल से संवाद करने में सफल हुई है।
‘गुड़ी के गोठ पढ़ना, मानों अपनी जड़ों से बतियाना है।”
डॉ० संतोष कुमार बघेल
समीक्षक-शिक्षाविद
बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 94792 73685

