बिलासपुर,(CGN 36)। पिछले कुछ माह से जिले के पुलिस विभाग में विभिन्न कारणों से निलंबन,लाइन हाजिर के मामलों ने एकाएक विभाग से जुड़े अमले को आश्चर्य चकित किया है । शराब ,गांजा जब्ती से लेकर प्रार्थी से मारपीट तक के मामलों में कई लोग निपटा दिए गए है। पुलिस विभाग में सुशासन चल रहा है लेकिन कुछ ज्वलंत प्रश्न भी है जिसका हल शायद ही मिल पाए।
पुलिस महकमे में थाने का सबसे पावरफुल अधिकारी थानेदार या टी आई ही होता है । थाने का पूरा स्टाफ थानेदार के हुक्म का पालन करता है । उसकी जानकारी के बिना थाना क्षेत्र में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । कहने का आशय यही है कि थाने का स्टाफ जो भी करेगा वह थानेदार की स्वीकृति और जानकारी के बगैर संभव नहीं है क्योंकि रोजनामचा उनके पास रहता है सी सी कैमरे लगे रहते है पूरे स्टाफ की जिम्मेदारी थानेदार ही तय करता है । किस स्टाफ को कहां जाना है और किसकी क्या ड्यूटी रहेगी यह सब थानेदार ही करता है और यदि कोई थानेदार कहता है कि उसकी जानकारी के बिना ही हो गया है या उसकी जानकारी में नहीं है तो वह थानेदार के लायक नहीं है। बताने का मतलब यही है कि थाने में और थाना क्षेत्र में जो भी अच्छा बुरा मातहत करते है उसकी पूरी जानकारी थानेदार को रहती है और उसकी सहमति से ही होती है। किसी मामले में थानेदार अपना पल्ला झाड़ ले तो यह जायज नहीं है ।
अभी हाल ही में मस्तूरी,कोटा रतनपुर आदि थाने के कुछ हवलदार ,सिपाही , एएसआई लाइन हाजिर और निलंबित किए गए । एस एस पी ने शिकायतों के आधार पर यह कार्रवाई की । यह एसएसपी के अधिकार क्षेत्र में है वे कार्रवाई कर सकते है इसमें किंतु परंतु का कोई सवाल नहीं उठता लेकिन प्रश्न यही है कि जिन पुलिस कर्मियों ने आरोपियों को बचाने /फंसाने के लिए उगाही की इसकी जानकारी संबंधित थाने के थानेदार को नहीं रही होगी? क्या ये थानेदार उन मामलों में हिस्सेदार नहीं रहे होंगे ? मामला उजागर होने पर हिस्सेदारी का हिस्सा अंदर और प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ कर निकल गए ।ऐसे मामलों में विभागीय जांच भी होती है तो थानेदार की भूमिका की कोई बात नहीं होती । ज्यादा हुआ तो एक नोटिस भर जारी कर दिया जाता है । थानेदार की नौकरी सही सलामत और थानेदार के लिए हिस्सेदारी का जुगाड करने वाले अमले को सजा मिल जाती है । हमारा आशय किसी दोषी कर्मचारी को बचाने या उसका पक्ष लेने का नहीं है और न ही तमाम थानेदारों पर आरोप लगाने का है लेकिन उगाही का आधा हिस्सा झटक लेने वाले थानेदार जांच के दायरे में क्यों नहीं आते यह बड़ा प्रश्न है। जांच के जाल में सिर्फ छोटी मछली ही क्यों फंसती है ? बड़ी मछली क्यों बच जाते है? हम तो यह भी जानना चाहते है कि शराब ,गांजा जैसे प्रकरणों में उगाही का मामला जब सामने आता है और कार्रवाई की जाती है तो ऐसे कर्मचारियों से जांच के दौरान क्या कभी पूछा जाता है कि उगाही की रकम में से थानेदार ने कितनी राशि झपट ली है। शायद यह सवाल जांच के दायरे से बाहर है। अभी एक और मामला सामने आया सकरी थाने का । हाईकोर्ट के एक अधिवक्ता का स्पष्ट कहना था कि थाना समझौता केंद्र कदापि नहीं हो सकता । आभूषण चोरी और उसे बेचे जाने के मामले में सकरी थाने में प्रार्थी को कुछ लाख के आभूषण उनसे वापस दिलाए गए जिन्होंने चोरी के आभूषण खरीदे थे। एक नाबालिग अपने ही घर में चोरी कर जेवरात बेच दिया तो इसमें अपराधी कौन होगा ? नाबालिग या चोरी के आभूषण खरीदने वाले ?
अब बात करें कोटा टीआई का , तो ये महोदय इसके पहले सीपत,रतनपुर में भी पदस्थ रहे है ।बताते है ये जहां भी पदस्थ रहे उनके कार्यकाल में एक दो पुलिस कर्मी के खिलाफ कार्रवाई हुई है लेकिन इनकी भूमिका पर कोई चर्चा तक नहीं हुई । अभी ये महोदय पिछले 4 माह से कोटा में पदस्थ है और दो माह पूर्व कोटा थाने के दो पुलिस कर्मी गांजा मामले में निपट गए यहां भी टी आई महोदय की भूमिका पर कोई बात नहीं हुई । उनकी जानकारी के बगैर यदि ऐसा कोई मामला हो गया तो यह तो उनकी लापरवाही ही मानी जाएगी । बात करें रतनपुर थाने की तो वहां बिलासपुर जिला मुख्यालय से ज्यादा राजनीति होती है और वहां के थाने में पदस्थ एएसआई तिवारी को निलंबित किया गया । उनके ऊपर प्रार्थी के साथ मारपीट करने का आरोप है। बहरहाल हमारा ऐसा मानना है कि उगाही आदि के मामलों पर निश्चित ही कार्रवाई हो लेकिन उस मामले में संबंधित थाने के थानेदार की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

