. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के स्मरण में भाव-विह्वल हुए आचार्य डॉ. गिरधर शर्मा

 

 बिलासपुर।दिनांक 17 मई 2026 को समन्वय साहित्य परिवार, छत्तीसगढ़ द्वारा बिलासपुर में ‘डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा प्रसंग’ का आयोजन किया गया। स्वास्थ्यगत कारणों से समारोह में उपस्थित न हो पाने वाले, डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के स्नेहपात्र, आचार्य डॉ. गिरधर शर्मा का कार्यक्रम संयोजक अनन्य शर्मा के साथ उनके निवास पर जाकर आत्मीय सारस्वत सम्मान किया गया ।

इन आत्मीय क्षणों में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा का पुण्य-स्मरण करते हुए डॉ. गिरधर शर्मा का कंठ अवरुद्ध हो गया और नेत्र अश्रुपूरित हो उठे। वे अतीत की उन विकट परिस्थितियों का स्मरण करने लगे, जब शांतिकुंज, हरिद्वार में समयदान की अवधि पूर्ण होने के पश्चात वे अपने पैतृक ग्राम न जाकर सीधे बिलासपुर आ गए थेबिलासपुर के जरहाभाठा क्षेत्र में उन्होंने सपरिवार एक किराए के आवास में निवास प्रारंभ किया। उस समय उनकी कुल स्थावर-संपत्ति थी— दो बिस्तर, कुछ घरेलू बर्तन और मात्र 500 रुपये नकद, जिसका उपयोग प्रारंभिक राशन-सामग्री क्रय करने में हो गया। एक सप्ताह के भीतर ही सारी सामग्री समाप्त हो गई और परिवार के समक्ष उदरपूर्ति का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया।

उस विपत्ति की घड़ी में प्रातःकाल वेदमाता गायत्री एवं परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी से उन्होंने इस घोर संकट से मुक्ति हेतु करुण प्रार्थना की। उसी दिन प्रातः 10:40 बजे एक चमत्कार घटित हुआ। डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कृष्णा शर्मा के साथ अकस्मात् उनके निवास पर पधारे। वे अपने साथ 50 किलोग्राम चावल, 10 किलोग्राम आटा, दाल, घी, तेल, नमक, शक्कर, सब्जियाँ, यहाँ तक कि दातुन और गमले सहित तुलसी का पौधा भी लाए थे। उन्होंने संकल्प-पाठ करवाकर 501 रुपये की दक्षिणा भी सहर्ष प्रदान की।

आचार्य डॉ. गिरधर शर्मा ने भावुक होते हुए बताया कि इस घटना के पूर्व डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा से उनका कोई परिचय अथवा संबंध नहीं था। यह नितांत चमत्कारिक एवं दैवीय संयोग था। उस समय उनकी स्थिति ‘अंधे को दो आँखें मिल जाने’ जैसी थी। मानो शर्मा दंपति साक्षात् ईश्वर-प्रेरित होकर उनके लिए दो नेत्र बनकर प्रकट हुए थे।

तत्पश्चात् आजीवन डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा एवं श्रीमती कृष्णा शर्मा उनके संरक्षक, मार्गदर्शक एवं आत्मीय अभिभावक बने रहे। उनके महाप्रयाण के उपरांत स्वयं को अनाथ-तुल्य अनुभव कर रहा हूँ—यह कहते-कहते डॉ. गिरधर शर्मा का गला पुनः भर आया।

निःसंदेह, आचार्य डॉ. गिरधर शर्मा की इस मर्मस्पर्शी एवं अविस्मरणीय आत्माभिव्यक्ति से डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा दंपति के संवेदनशील, उदार, परदुःखकातर एवं परोपकारी स्वरूप का पुनः साक्षात्कार हुआ। यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व की उस दिव्य आभा को उजागर करता है, जो सच्चे अर्थों में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का जीवन्त उदाहरण है।

निर्मल माणिक/ प्रधान संपादक मोबाइल:- / अशरफी लाल सोनी 9827167176

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