अमित ऐश्वर्य जोगी को आखिरकार छग हाईकोर्ट ने जग्गी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुना दी । अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट जाना अपरिहार्य हो गया था सो उन्होंने नामी गिरामी वकीलों के माध्यम से न्याय पाने के लिए सर्वोच्च संस्था की शरण में जा पहुंचे। उनकी याचिकाओं पर 20 अप्रैल को सुनवाई होगी इसी बीच अमित जोगी ने फेसबुक में अपनी बात रखी । न्याय पाने का अधिकार देश के हर नागरिक को है ।अमित जोगी को भी है। आइए जानें फेसबुक में अमित जोगी ने क्या लिखा है। बंदे के बात में दम तो है । दोस्तो “ये कैसा न्याय है” की हेडिंग के साथ उन्होंने और क्या लिखा है आइए विस्तार से पढ़िए:
दोस्तों ये कैसा न्याय है?
बिना सुने सूली पर चढ़ा देना — ये कैसा दस्तूर है?
हमारे देश की न्याय व्यवस्था की बुनियाद “प्राकृतिक न्याय” के सिद्धांत पर टिकी है —
कि हर व्यक्ति को सुना जाएगा, हर पक्ष को अवसर मिलेगा।
इतिहास गवाह है —
महात्मा गांधी के हत्यारों को भी लाल क़िला में पूरा अवसर दिया गया, उन्हें सुना गया, उनकी दलीलें सुनी गईं।
लेकिन मेरे मामले में क्या हुआ?
उच्च न्यायालय के कल अपलोड हुए फैसले के पैरा 37 में स्वयं अदालत ने लिखा:
“Be that as it may, in the compelling circumstances… this Court proceeds to consider and decide the matters on the basis of the submissions advanced by learned Counsel appearing for the CBI, the State, and the complainant…”
इसका सीधा अर्थ क्या है?
कि अदालत ने केवल एक पक्ष को सुनकर — CBI, राज्य और शिकायतकर्ता — के आधार पर निर्णय लिया।
यानी मुझे, मेरे वकीलों को — एक शब्द भी कहने का अवसर नहीं दिया गया।
क्या यह न्याय है?
आप स्वयं 78 पन्नों का पूरा निर्णय पढ़ लीजिए —
कहीं भी एक भी स्थान ऐसा नहीं मिलेगा जहाँ लिखा हो:
“अमित ने अपनी सफाई में यह कहा…”
क्यों?
क्योंकि मुझे सुना ही नहीं गया।
12,000 पन्नों के रिकॉर्ड, गवाहियों और साक्ष्यों वाले मामले में —
सिर्फ 7 दिनों के भीतर —
मुझे आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई।
और विडंबना देखिए —
उसी फैसले में यह भी कहा गया कि मैं और मेरे वकील कार्यवाही में विलम्ब कर रहे थे!
जो संस्थाएँ “सच, पूरा सच और सच के सिवा कुछ नहीं” सुनने, समझने और परखने की जिम्मेदारी निभाती हैं —
क्या उन्हें चयनात्मक होना चाहिए?
क्या न्याय एकतरफा हो सकता है?
और क्या हम यह मान लें कि कुछ “असाधारण” क्षमताएँ भी काम कर रही थीं—
जहाँ 12,000 पन्नों का रिकॉर्ड, पूरी दलीलें, और 78 पन्नों का फैसला
सिर्फ 3 दिनों में तैयार हो गया—
जबकि तीनों दिन अवकाश थे (Good Friday, शनिवार और Easter Sunday)?
मैं ये प्रश्न केवल अपने लिए नहीं —
बल्कि हर उस नागरिक के लिए पूछ रहा हूँ,
जो न्यायपालिका पर भरोसा करता है।
अब 20 अप्रैल को
माननीय सर्वोच्च न्यायालय
मुझे सुनवाई का अवसर देगी।
आख़िरकार — मेरी बात भी सुनी जाएगी।
मुझे न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है।
मुझे सत्य पर विश्वास है।
और मुझे ईश्वर पर विश्वास है — कि मेरे साथ अन्याय नहीं होगा।
सत्य की जीत निश्चित है।
अमित जोगी

