
बिलासपुर/ महाराणा प्रताप चौक, बिलासपुर में 12 साल पहले 02 नवंबर 2014 स्थापित प्रतिमा के लोकार्पण शिलालेख में अंकित *’राष्ट्रकवि डॉ. ब्रजेश सिंह’* की उपाधि पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे की शिकायत पर छत्तीसगढ़ शासन के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने गंभीर रुख अपनाते हुए कलेक्टर बिलासपुर और आयुक्त नगर निगम बिलासपुर को *10 दिन के भीतर शिलालेख की जांच कर आवश्यक सुधार* करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।
*क्या है पूरा मामला?*
22 मई 2026 को रायपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे ने कलेक्टर बिलासपुर, कमिश्नर नगर निगम और मुख्य सचिव को स्पीड पोस्ट से शिकायत भेजी थी। शिकायत में कहा गया कि महाराणा प्रताप चौक के लोकार्पण शिलालेख में ‘राष्ट्रकवि डॉ. ब्रजेश सिंह’ का नाम अंकित है, जो तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक है।
*शिकायत में उठाए गए 3 बड़े सवाल:*
1. *’राष्ट्रकवि’ की उपाधि*: स्वतंत्र भारत में प्रामाणिक रूप से केवल *मैथिलीशरण गुप्त* और *रामधारी सिंह दिनकर* को ही ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में सर्वमान्य मान्यता प्राप्त है। महात्मा गांधी ने 1936 में मैथिलीशरण गुप्त को ‘राष्ट्रकवि’ कहा था। छायावाद के प्रमुख स्तंभ और ‘महाप्राण’ कहे जाने वाले *सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’* को भी यह उपाधि नहीं मिली। ऐसे में डॉ. ब्रजेश सिंह को ‘राष्ट्रकवि’ लिखना इतिहास से छेड़छाड़ है।
2. *’डॉ.’ की उपाधि पर सवाल*: शिकायतकर्ता के अनुसार डॉ. ब्रजेश सिंह केवल डिप्लोमा इंजीनियर (सिविल) हैं। वे ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट नहीं हैं। UGC नियमों के मुताबिक बिना पोस्ट ग्रेजुएशन के पीएचडी नहीं की जा सकती। इसलिए ‘डॉ.’ लिखना भी संदिग्ध है।
3. *भविष्य के लिए खतरा*: शिलालेख सरकारी दस्तावेज है। आने वाले समय में इतिहासकार और शोधार्थी इसे ‘ऐतिहासिक प्रामाणिक दस्तावेज’ मानेंगे। गलत जानकारी से आने वाली पीढ़ी गुमराह होगी।
*शासन की त्वरित कार्रवाई:*
मुख्य सचिव कार्यालय को 22 मई की शिकायत 26 मई को जावक क्रमांक 1030341 के जरिए प्राप्त हुई। इसके बाद नगरीय प्रशासन विभाग ने 29 मई 2026 को आदेश क्रमांक LAND-43010/1/2025-UAD जारी किया।
अवर सचिव आनंद कुमार पटेल द्वारा जारी पत्र में कलेक्टर और आयुक्त को निर्देश दिया गया है:
> _”शिलालेख पर अंकित त्रुटियों एवं कमियों का तत्काल परीक्षण/आकलन करें तथा नियमानुसार आवश्यक सुधारात्मक कार्यवाही सुनिश्चित करें तथा की गई कार्यवाही की विस्तृत रिपोर्ट 10 दिवस के भीतर इस विभाग को अनिवार्यतः उपलब्ध कराएं।”_
*********************************************
*मैथिलीशरण गुप्त* को गांधी जी ने ‘भारत-भारती’ पढ़कर इन्हें राष्ट्रकवि कहा था ।
*रामधारी सिंह दिनकर*: ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ जैसी ओजस्वी राष्ट्रीय कविताओं के कारण यह सम्मान मिला।
*निराला*: ‘महाप्राण’, पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता होने के बावजूद उन्हें राष्ट्रकवि नहीं कहा गया।

*******************************************
शासन के आदेश के अनुसार *8 जून 2026 तक* कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त को शिलालेख की जांच कर रिपोर्ट देनी है और गलती सुधारनी है। शिकायतकर्ता राकेश चौबे ने कहा कि यदि तय समय में सुधार नहीं हुआ तो सूचना के अधिकार सहित यथोचित विधि सम्मत कार्यवाही की जाएगी।
*विशेषज्ञ की राय*:
नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ साहित्यकार ने बताया, “सरकारी शिलालेख पर बिना प्रमाण के ‘राष्ट्रकवि’ लिखना गंभीर त्रुटि है। यह भविष्य के लिए गलत नजीर बनेगी। शासन का त्वरित संज्ञान लेना सराहनीय है।”
फिलहाल सभी की निगाहें बिलासपुर जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह 10 दिन में शिलालेख से ‘राष्ट्रकवि’ और ‘डॉ.’ की गलत उपाधि हटाता है या नहीं ?
*विशेषज्ञों का अभिमत: ‘मानद उपाधियों पर स्पष्टता जरूरी’* *1. ‘राष्ट्रकवि’ पर स्थिति:*
स्वतंत्र भारत में केवल *मैथिलीशरण गुप्त* और *रामधारी सिंह दिनकर* को ही सर्वमान्य रूप से ‘राष्ट्रकवि’ माना गया है। ‘महाप्राण’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जैसे युगपुरुष को भी यह उपाधि नहीं मिली। ऐसे में सरकारी शिलालेख पर बिना प्रामाणिक आधार के किसी को ‘राष्ट्रकवि’ लिखना तथ्यात्मक रूप से गलत और आने वाली पीढ़ियों को गुमराह करने वाला है।
*2. ‘डॉ.’ उपाधि का दुरुपयोग:*
UGC नियमों के अनुसार बिना पोस्ट ग्रेजुएशन के पीएचडी नहीं हो सकती। यदि कोई व्यक्ति केवल डिप्लोमा धारक है तो उसके नाम के साथ ‘डॉ.’ लिखना नियम विरुद्ध है।
*3. मानद उपाधि धारकों के लिए दिशा-निर्देश की अपील:*
नाम के साथ ‘डॉक्टर’ लिखने वाले मानद उपाधि-धारकों को यह स्पष्ट रूप से उल्लेख करना चाहिए कि उनकी उपाधि मानद है। जिस प्रकार कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त व्यक्ति के नाम के साथ ‘दर्जा प्राप्त’ अंकित किया जाता है, ताकि आम नागरिक को यह स्पष्ट हो जाए कि वे वास्तविक मंत्री नहीं हैं, उसी प्रकार मानद उपाधि-धारक डॉक्टर्स के लिए भी ऐसा उल्लेख किया जाना अनिवार्य होना चाहिए।
इससे जनता में भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी, छल-कपट करने वाले पेशेवर व्यवसायियों द्वारा मासूम लोगों को ठगने की संभावना समाप्त होगी तथा उपाधि का दुरुपयोग भी रोका जा सकेगा।
उच्च शिक्षा विभाग एवं संस्कृति विभाग से इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करना अपेक्षित है।
—



