
डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा
भारत वर्ष उत्सव मंगल हर्ष पर्व का देश है, जीवन के प्रति समाज देश के प्रति आशा, आस्था, जिगीषा, जिजीविषा का विशेष आग्रह है. इसीलिए नव संवत्सर का आरंभ ही वर्ष प्रतिपदा से होता है। आई-दूज यम द्वितीया, अक्षय तृतीया, गणेश चतुर्थी, नाग पंचमी, हलषष्ठी, संतान सप्तमी, जन्माष्टमी, रामनवमी, विजयादशमी, देवउठनी एकादशी, शिवरात्रि, हरेली, पोला, दीवाली अमावस्या, शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा – जैसे लगातार वर्ष अर अनेक अनेक उत्साह-उल्लास पूर्ण उत्सव भारत की अपनी विशेषता है। यह त्यौहारों का अनोखा देश है। जन्मोत्सव जयंती मनाने की परंपरा है, मरण तिथि मनाने की नहीं। अंधकार की अपेक्षा आलोक, मृत्यु की अपेक्षा जीवन को प्राथमिकता दी है, इसीलिए मरण भी हमारे यहां त्यौहार है, क्योंकि आत्मा अजर है, अमर है, शरीर नष्ट होते हैं. आत्मा नहीं।
पंडित रमाकांत मिश्र शास्त्री के अनुसार कार्तिक शुक्ल नवमी को धात्री वृक्ष (आँवला) की पूजा कर उसकी छाया में भोजन बनाकर भगवान को भोग लगा ब्राम्हण कुटुम्बी आदि को भोजन कराने पर बहुत पुण्य होता है। धात्री पूजन कैसे करना चाहिए उसकी विधि और मंत्रों का वर्णन किया जा रहा है।
धात्री वृक्ष के नीचे कलश जलाकर गणेश स्मरण कर संकल्प करें।
ॐ विष्णु-विष्णु विष्णु: तिथि आदि का स्मरण करते हुए “मम समस्त पापाक्षाय वुराकां दामोदर प्रीतये धात्री मूले विष्णु पूजनमहं करिष्ये” का पाठ करें।फिर पुरुष सुक्त से या किसी प्रकार सोलहों प्रकार भगवान और ऑवले की पूजा कर अर्ध देवे –
अध्ये अध्ये गृहं भगवान, सर्व काम प्रदोषभव:।
अक्षयः सतनान्तिर्मेस्तु, दामोदर नमोस्तुते धात्री पूजन विधि –
“ॐ धात्र्य नमः” “ॐ स्वाध्याय नमः” इत्यादि मंत्रों से धात्री का पूजन करें तथा वृक्ष के चारों ओर दीपदान करें। 16 दीप दें।
1ॐ धात्र्ये नमः
2ॐ स्वाध्यायै नमः
3ॐ कामन्याय नमः
4ॐ शिवाय नमः
5ॐ विष्णुपत्न्यै नमः
7ॐ रामाय नमः
8 ॐ इन्दिराय नमः
9ॐ लोकमात्राय नमः
10.ॐ ब्रह्माय नमः
11ॐ शांतिये नमः
12ॐ मेघाय नमः
13ॐ गायत्री नमः
14.ॐ सुधृत्यै नमः
15 ॐ विश्वरूपायै नमः
16. ॐ अग्नि मेधाय नमः
फिर यात्री की जड़ में दूध गंगाजल तिल-जव लोटे में लेकर तर्पण कर जल डाले
तर्पण मंत्र-
“पितामहश्चैव, अपुत्रोये च गोत्रिनः।
ते पिवन्तु मया दत्त, धात्रीमुलेऽक्षयं पयः।।
“अब्रह्म स्तम्भ पर्यन्तं, देवर्षि पितृ मानव:।।
ते पिवन्तु मया दत्त, धात्री मूलेऽक्षयं पयः।।
फिर धात्री वृक्ष में सूत्र लपेटते हुए परिक्रमा करें-सूत्र बंधन-
मंत्र – दामोदर निवासाय, धात्र्य देव्या नमोऽस्तुते।। सुत्रेनानेन बध्नामि, धात्री देविंमोस्तुते।।
प्रणाम कर भोग लगाकर भोजन ग्रहण करे। सफेद कुम्हड़े (रखिया) का दान उत्तम होता है।वर्ष भर में एकादशी की संख्या 26 होती है, किन्तु देवशयनी और देव उठनी एकादशी का विशेष महत्व है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी देवशयन के बाद बड़े मांगलिक उत्सव रुक जाते हैं. फिर कार्तिक शुक्ल एकादशी-देव प्रबोधन- के बाद उत्सव शुरू हो जाते हैं।
वराह पुराण के अनुसार एक वेदी पर सोलह पॉखुरिया का कमल बनाकर जल, रत्न, चंदन तथा सफेद वस्त्र से चार कलश ढांककर स्थापित करें तथा उनके बीच चतुर्भुज धारी विष्णु तथा शेषधायी के सोने की प्रतिमा स्थापित करके ऋचाओं द्वारा पूजन करे, जागरण के पश्चात् दूसरे दिन चार वेदपाठी ब्राम्हणों को चार कलश तथा पांचवें को स्वर्ण प्रतिमादान देकर, भोजन करवाकर भोजन करें यही विधान है।
मदन रत्न ग्रंथ के अनुसार वर्षा के चार माह आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक ब्रहम, इंद्र, रुद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर, सूर्य और सोम आदि देवों के भी पूजनीय महाप्रभु और सागर में चार मास शयन करते हैं। यद्यपि भगवान कभी भी क्षण भर सोते नहीं, तथापि उपासना के इस विधान के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी को रात्रि के समय हरि को जगाया जाता है। स्त्रोत, भजन, घंटा शंख बजाकर उन्हें जगाना ही पूजा है।
मंत्र द्वारा उन्हें जगाया जाता है-
उत्कृष्ट गोविंदा त्याज निद्रा जगत्पते।
जगन्नाथ आप सुप्त हैं, जगत सुप्त है।
उत्थिते चेष्टे सर्वा मुथिष्टोत्तिष्ठ माधव।
गाता मेघा वियचेवा निर्मला निर्मला डिश।।: भगवान को मंदिर या आसन में विभिन्न पुरुषों द्वारा सुसज्जित किया जाता है और विष्णु पूजन कर कपूर से नीरजना (आरती) की जाती है। फिर “यज्ञ यज्ञ मयजन्त देवस्थानि धर्मानि प्रथमन्यासन” मंत्र के साथ पुष्प अर्पित करें। पूजा के बाद, भगवान को पालकी में बिठाकर नगर भ्रमण कराएँ। इस प्रकार भगवान योग निद्रा त्यागकर प्राणियों का पोषण करते हैं।
पद्म पुराण के अनुसार उपवास रहकर सोने या चांदी की लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा का पूजन कर तुलसी मंजरी अर्पित करें-
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप कर व्रत पूर्ण करे।
यह एकादशी छत्तीसगढ़ में तुलसी विवाह अनुष्ठान के रूप में प्रसिद्ध है। गन्ने का मंडप बनाकर नवीन तुलसी तरू का विवाह करें। गणेश मातृका पूजन के बाद श्री लक्ष्मी नारायण की मूर्ति के साथ गोधूली बेला में तुलसी कन्या का दान करें, वस्त्र भूषण दान करें, कुलीन ब्राम्हण को तृप्त कर स्वयं भोजन कर व्रत का पालन करें-यही देव बोधिनी एकादशी है।
छत्तीसगढ़ में यादव-वीर इसी एकादशी से महाप्रभु श्री कृष्ण की रासलीला का लोक महोत्सव “मड़ई” नृत्यगान प्रारंभ करते हैं। गोपाल-गोवर्धन अन्नकूट-कार्तिक पूर्णिमा अन्न लक्ष्मी के पूजन का समापन समारोह है। दोहा प्रसिद्ध भी है-
आवत देवारी लुहलुहिया,
दीवाली की कली को फेंक दो।
जा जा देवारी अपन घर,
फागुन उड़ाही धूर ।।

डा० पालेश्वर प्रसाद शर्मा विद्यानगर बिलासपुर छग
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Thu Oct 30 , 2025
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