“जाग सके तो जाग “हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास को ढूंढने से भी संत कबीर जैसा विचारक,समाज सुधारक,कवि नहीं मिलता

(लोक जागरण के सजग प्रहरी संत कबीर 629वीं जयंती पर विशेष आलेख)

हिंदी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संत कबीर को “वाणी का डिक्टेटर” की उपाधि देते हुवे कहा ,हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास को ढूंढने से भी संत कबीर जैसा विचारक,समाज सुधारक,कवि नहीं मिलता ।हिंदी साहित्यक का मध्यकाल जिसे पूर्व मध्यकाल या भक्तिकाल कहा जाता है,यह वह काल था जिससे संत कवियों ने अपनी वाणी के माध्यम से समाज में एक नया बदलाव ला सका। वीरगाथा काल में हुवे नरसंहार ने समाज में व्याकुलता,घृणा ,हाहाकार मचा दिया था, इससे समाज को मुक्ति दिलाना जरूरी था,संत कबीर, जायसी, सूर, एवं तुलसी आदि भक्तिकाल के कवियों ने सन् 1318से सन् 1643के बीच इन 325वर्ष के इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ले आया,आम जन का ध्यान भक्ति के माध्यम से ईश्वर को जानने समझने की होने लगी।वीरगाथा काल में जहां मार काट,दंगा फसाद, लड़ाई झगड़े का बोल बाला था,राजा लोग अपने निजी स्वार्थ उपनिवेशवादी भावना से जनता को जनता से आपस में लड़वाकर मार काट करवाते थे,वह सब भक्ति काल में बंद हो गया।सामान्य जनता के बीच भक्ति के माध्यम से आपस में एकता,भाई चारा ,अपनापन,विश्वास पनपने लगा।सूर और तुलसी ने अपने ग्रन्थ में क्रमशः श्री कृष्णऔर श्री राम की सगुण रूप की भक्ति उनके प्रेम तथा आदर्श (मर्यादा) की स्थापना कर दी,वही दूसरी ओर संत कबीर और जायसी ने निर्गुण रूप में ज्ञान भक्ति और प्रेम भक्ति की स्थापना कर दी।

संत कबीर की वाणी ने साखी, शबद और रमैनी के माध्यम से उनके प्रमुख ग्रन्थ “बीजक” में संकलित कर ली गईं।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “कबीर”में संत कबीर को केवल कवि या समाजसुधारक नहीं कहा अपितु उन्हें एक सच्चे संत एवं महान समन्वयकारी करार दिया।आचार्य द्विवेदी जी कहते हैं..”भाषा पर कबीर का अधिकार जबरजस्त था,उनकी भाषा पंचमेल खिचड़ी थी,इसीलिए कबीर वाणी के डिक्टेटर थे,सच मायने में कबीर जैसा रचनाकार आज तक दिखाई ही नहीं देता।”आज हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहे हैं,चारों ओर चकाचौंध,आधुनिकता एवं नई नई तकनीकी, परमाणु बम, भूमंडलीय करण के इस युग में जहां पर प्रतियोगिता की भावना ने कोरी – विकास को गति दिया है वहीं विश्व मानवता चकनाचूर होने लगी है,आदमी और आदमी के बीच आज वैमनस्य,कटुता ,ईर्ष्या,द्वेष घृणा ने अपना सिर ऊंचा कर लिया है।आज की राजनीति ,राजनीति न होकर कूटनीति के रूप में अपना जाल बिछा ली हैं। आज गांव , में राजनीतिक चर्चाए इतनी हावी हो गई हैं, कि जंगल , जमीन और पहाड़ में बसने वाले सीधे साधे लोगों, मालिकों के बीच ही आपस में बैर ,जातिवादी विचार धारा फैलाकर सरकार उन्हें ही एक दूसरे से लड़ाने में आमदा हो गई जिससे कटुता का जहर फैलते जा रहा है।संत पुरुषों ने जहां भक्ति का सर्वोच्च स्थल को पूजित किया उसे हीआज धर्म के ठेकेदारों ने कलंकित करना अपने निजी स्वार्थ के लिए शुरू कर दिया है।इससे विश्वमानवता प्रभावित हुवे बिना नहीं रह सकती है,। संत कबीर ने अपनी वाणी , साखी (साक्षी)के माध्यम से लोकजागरण कर मानवता वाद की स्थापना आज से लगभग 700पहले ही कर लिया था,आज वही फिर कलंकित होने के कगार पर हैं।देश के युवाओं का समय और अधिकार खुले आम छीना जा रहा है,लोग मूक दर्शक के रूप में ताली बजाने लगे हैं,घर ,परिवार, पड़ोसी के रिश्ते आपस में कलंकित हो रहे हैं,ऐसे में संत कबीर की वाणी प्रमुखता से पढ़े जाने एवं जीवन में उसे हृदयंगम करने की जरूरत आ पड़ी है।पोथी पढ़ पढ़ जग मुवा …ढाई आखर प्रेम को फिर से पढ़ना ही होगा,ईश्वर के उस प्रेम रूप को भीतर से पहचान करना होगा। आज पूरे देश.विदेश,गांव,गली,मुहल्ले, में कबीर की भजन ऑडियो,वीडियो, भजनकर, गायकों के माध्यम से दुहराई जा रही है,इससे कुछ भी होने वाला नहीं है,आज कबीर के नाम पर ही 252पंथ पूरे विश्व में चल पड़े हैं,सबकी अपनी अपनी डफली बज रही है, राग भी अलग अलग हैं,कोई कबीर के नाम को साहेब बंदगी कहता है,कोई सत साहेब,तो कोईकुछ और माला तिलक चंदन ,टोपी शैली सब अलग अलग,पहनावा भी बहुरंगी यह सब किन्हे दिखाने और क्या बताने के लिए है,समझ से परे है।जिन चीजों ,मान्यताओं को संत कबीर ने ढोंग,कुरीति,आडंबर, कहकर उसका समूल नाश करने का बीड़ा उठाया था,उसे ही कबीर के नाम पर पंथ चलाने वालों ने कबीर की नहीं अपना चलाने लगे हैं।कबीर ने कहा था..”तू कहता सब कागद लेखी, हों कहता निज आँखिन देखी”।

आइए संत कबीर की वाणी को हम सच्चे मन से आत्मसात करें,कबीर वाणी को जीवित और जागृत करें,ईश्वर नाम रूपी प्रेम को अपने आत्मा में पुनर्स्थापित करें,ईश्वर की सच्ची भक्ति करना सीख लें, शपथ लें,संकल्पित हों लें,इस कबीर जयंती महापर्व पर।क्योंकि संत कबीर ने कहा था..”प्रेम न बाड़ी उपजे,

प्रेम न हाट बिकाए

राजा परजा जेहि रुचे

सीस देहि ले जाए।।”

गोस्वामी तुलसीदास ने “जीव मात्र” को ईश्वर अंश कहा..”ईश्वर अंश जीव अविनाशी,चेतन अमल सहज सुखराशी”,वहीं संत कबीर ने ईश्वर का अंश रूप आत्मा को लोकजन के हृदय में अवस्थित बताया।यथा –

“मोको कहां ढूंढे बन्दे

मैं तो तेरे पास हूं”।

सतनाम पंथ के पुजारी बाबा गुरु घासीदास ने उसे ही “घट घट म बसे हे सतनाम ,खोजे ले हंसा कहाँ पा बे रे कहा।”

उस परम तत्व को हम मंदिर में,मस्जिद में,गिरिजाघर,गुरुद्वारे में ढूंढने चले हैं,वह तो हमारे भीतर ही विराजमान है।कबीर की वाणियों में..

“तेरा साईं तुझ में

ज्यों पपुहन में बास

कस्तूरी का मिरग ज्यों

फिरि फिरि ढूंढे घास।”

उस व्यापक ब्रह्म को संत कबीर ने बहुत ही सहजता से लोक जन को जनवाने की कोशिश की है यथा..

“ज्यों तिल माही तेल है

और चकमक में आग

तेरा साईं तुझ में है

जाग सके तो जाग।”

कबीर का संबंध सीधा लोक जागरण से है,उनकी वाणी में बहुत बड़ी शक्ति है।उस शक्ति की प्राप्ति के लिए कबीर रात – दिन जागरण कर रहे हैं..

“सुखिया सब संसार है

खाए और सोवे

दुखिया दास कबीर है

जागे और सोवे।”

जागना कोई हंसी खेल नहीं है।जागने वाले को रात – दिन संघर्ष करनी पड़ती है ,कर्म के बलबूते पर इच्छित फल की प्राप्ति निश्चित ही हो जाती है।इसलिए कहा भी गया है..”जिन जागा तिन माणिक पाया।”संस्कृत में एक कहावत है”सर्वत्र ही दु: खम,विवेकित:”अर्थात विवेकी या ज्ञानी को सब दुःख ही दुःख है।उसी तरह सत्य का साक्षात्कार कर पाना सहज कार्य नहीं है,उसी तरह दुनियां में लोगों को समझ पाना उसी तरह संभव नहीं है जैसे हंस और बगुला।कबीर वाणी में इस बात को देखिए..

“हंसा बगुला एक सा,मानसरोवर माही

बगा ढिंढोरा माछरी,हंसा मोती खाहीं।

संत कबीर फक्कड़ाना अंदाज में मस्त मौला रहते थे,वे अपने परमात्मा के ध्यान में इस तरह लगे रहते थे..

“मन मस्त हुवा तब क्यों बोलें

हीरा पायो गांठ गठियाओं

बार बार वाको क्यों खोलें।”

संत कबीर की दृष्टि में “राम”ही ब्रह्म हैं,वही सभी को जगा रहे हैं। उस “राम “के चार रूप हैं-

,”जुग में चारों राम हैं

तीन राम व्यवहार

चौथ राम निज सार है

ताको करो विचार।”

इन चारों राम की आराधना में लोग “अपने अपने राम” को जानने की कोशिश में लगे हुवे हैं –

“आकार राम दशरथ घर डोलै,

एक राम घट घट म बोलै।

एक राम का सकल पसारा,

एक राम त्रिभुवन से न्यारा।”

निष्कर्ष रूप में कहें तो कबीर का “प्रेम”ही ईश्वर का स्वरूप है,जो घट घट में बिराजमान है,वही शाश्वत है,सत्य है,जागृत है,उसे ही जाग कर जानने की जरूरत है।कबीर जन मानस को आज भी जगा रहे हैं, उसे ही जानने को कोशिश ही सही मायने में कबीर जयंती को सफल बनाना होगा।उन्हीं की पंक्ति ..

“साखी आँखी ज्ञान की

समझ देख मन माही।

बिन साक्षी संसार की,

झगरा छूटत नाहीं ।।”

प्रस्तुति : फूलदास महंत सहायक प्राध्यापक हिंदी नवीन शासकीय महाविद्यालय सकरी जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़

निर्मल माणिक/ प्रधान संपादक मोबाइल:- / अशरफी लाल सोनी 9827167176

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