
पहली पत्नी को खुद जुटाने पड़ते हैं सबूत, प्रदेशभर के मामलों की केस स्टडी कर तैयार होगा प्रस्ताव
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त डॉ. ममता साहू ने कहा कि पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी या दूसरी महिला को पत्नी के रूप में रखने के मामलों में पीड़ित महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूसरी शादी को साबित करने की होती है। ऐसे मामलों में सीधे एफआईआर की प्रक्रिया नहीं होने से महिला को अदालत में शिकायत पेश कर गवाही और दस्तावेजों के जरिए विवाह साबित करना पड़ता है। कई बार दूसरी महिला पत्नी होने से ही इनकार कर देती है। ऐसे मामलों की कानूनी जटिलता दूर करने के लिए महिला आयोग प्रदेशभर के प्रकरणों की केस स्टडी कर कानून में बदलाव की सिफारिश करेगा।
डॉ. साहू ने सोमवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि दूसरी शादी के मामलों में साक्ष्य जुटाना सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने एक प्रकरण का उदाहरण देते हुए बताया कि पुलिस जब संबंधित व्यक्ति के घर पहुंची तो वहां रह रही महिला ने खुद को पत्नी के बजाय नौकरानी बताया। ऐसी परिस्थितियों में पहली पत्नी के लिए यह साबित करना बेहद कठिन हो जाता है कि पति ने दूसरी शादी की है।
उन्होंने कहा कि आयोग अब पूरे छत्तीसगढ़ से ऐसे मामलों की जानकारी जुटाएगा। अलग-अलग प्रकरणों में सामने आने वाली कानूनी और व्यावहारिक दिक्कतों का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद विधि विशेषज्ञों, पुलिस, न्यायिक क्षेत्र, महिला एवं बाल विकास विभाग, एनजीओ और आम लोगों के साथ चर्चा की जाएगी। मीडिया से भी सुझाव लिए जाएंगे। सभी पहलुओं का अध्ययन करने के बाद आयोग कानून में आवश्यक बदलाव के लिए सरकार को अनुशंसा करेगा।
पुलिस के साथ होगी धाराओं की समीक्षा
महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि महिलाओं से जुड़े कई प्रकरणों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 और 69 के तहत कार्रवाई की स्थिति बनती है। इन मामलों को लेकर पुलिस अधिकारियों के साथ बैठकर समीक्षा की जाएगी। हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं को भी चर्चा में शामिल कर कानूनी पहलुओं पर सलाह ली जाएगी। उन्होंने कहा कि पहले आयोग खुद इन प्रावधानों और मामलों की जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझेगा, इसके बाद संबंधित पक्षों के लिए आवश्यक मार्गदर्शन तैयार किया जाएगा।
पुलिस-न्यायपालिका के साथ ट्रेनिंग
उन्होंने कहा कि महिलाओं को त्वरित और प्रभावी न्याय दिलाने के लिए पुलिस विभाग, न्यायपालिका, महिला एवं बाल विकास विभाग और एनजीओ को साथ लेकर लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। रायपुर और अंबिकापुर सहित प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर प्रशिक्षण शिविर लगाए जा रहे हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ समन्वय कर भी कई कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी है।
सरगुजा के मामले से बनी थी कानून की जरूरत
डॉ. साहू ने महिलाओं के खिलाफ गंभीर उत्पीड़न के एक पुराने सरगुजा प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि एक महिला को बेहद अमानवीय तरीके से प्रताड़ित किया गया था। उसके निजी अंगों में मिर्ची डालकर यातना देने जैसी घटना सामने आई थी। मामले की जांच और उसके बाद की प्रक्रिया ने महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनी प्रावधानों की जरूरत को सामने रखा।
मीडिया की निगरानी से बेहतर होता है काम
महिला आयोग की अध्यक्ष ने मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पत्रकार लगातार मुद्दों को उठाते हैं तो आयोग और प्रशासन भी अधिक सचेत रहते हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया से मिलने वाले सुझावों को गंभीरता से लिया जाएगा। आयोग का प्रयास रहेगा कि महिलाओं से जुड़े मामलों में केवल सुनवाई तक सीमित रहने के बजाय कानूनी और संस्थागत स्तर पर भी स्थायी समाधान की दिशा में काम किया जाए।
उन्होंने बताया कि अध्यक्ष पद संभाले अभी करीब ढाई-तीन माह ही हुए हैं, लेकिन इस दौरान लगातार जनसुनवाई और प्रदेश के विभिन्न जिलों के दौरे हो रहे हैं। कई बार जनसुनवाई में 30 से 35 मामले एक साथ आते हैं और सुबह 11 बजे से शुरू हुई सुनवाई शाम पांच-छह बजे तक चलती है। उन्होंने कहा कि मामलों की संख्या और जटिलता अधिक होने के बावजूद आयोग महिलाओं की समस्याओं को गंभीरता से सुनकर समाधान की दिशा में काम कर रहा है।
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