पद्मश्री ,पद्म विभूषण जैसे राष्ट्रीय पुरस्कारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला ,बिलासपुर में भी त्रुटि सुधारने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र

पद्मश्री ,पद्म विभूषण जैसे राष्ट्रीय पुरस्कारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला ,बिलासपुर में भी त्रुटि सुधारने    रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे ने  राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है ।

*तथ्य:*

याचिकाकर्ता बालाजी राघवन ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत केरल उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर सरकार को पद्म विभूषण और पद्म श्री जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करने से रोकने के लिए परमादेश जारी करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि ये पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18(1) का उल्लंघन करते हैं, जो राज्य द्वारा गैर-सैन्य या गैर-शैक्षणिक उपाधियाँ प्रदान करने पर रोक लगाता है। 1992 से 1994 के बीच दोनों पक्षों ने लिखित अभिवेदन प्रस्तुत किए, लेकिन केरल उच्च न्यायालय द्वारा कोई मौखिक बहस या अंतरिम आदेश नहीं दिया गया। मामला 1993 में सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया।

*न्यायालय के समक्ष मुद्दे*

क्या भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री पुरस्कार भारत के संविधान के अनुच्छेद 18(1) के अर्थ में ‘उपाधि’ की श्रेणी में आते हैं?

*न्यायालय के समक्ष तर्क*

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 18(1), जो राज्य द्वारा प्रदत्त उपाधियों पर रोक लगाता है, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की उपाधि देने की प्रथा को समाप्त करने के लिए था, क्योंकि स्वतंत्रता से पहले ऐसी उपाधियों ने जनता में अवमानना पैदा की थी। उन्होंने जोर दिया कि “उपाधि” शब्द की व्याख्या व्यापक रूप से की जानी चाहिए ताकि इस मंशा के अनुरूप हो, और यह सामाजिक पदानुक्रम बनाने वाली किसी भी राज्य मान्यता को कवर करे। पद्म श्री या भारत रत्न जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार, भले ही वंशानुगत न हों, नागरिकों के बीच रैंक स्थापित करने के लिए आलोचित किए गए (उदा. “पद्म विभूषण” का अर्थ “पद्म श्री” से उच्च दर्जा होना), जो ब्रिटिश-काल के भेदभाव के समान है। उन्होंने दावा किया कि यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह प्रतीकात्मक विशेषाधिकार देकर असमानता को बढ़ावा देता है। उन्होंने नोट किया कि अनुच्छेद 18 के तहत केवल सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टताएँ (उदा. “प्रोफेसर” या “जनरल”) ही अपवाद हैं, जिनकी स्पष्ट अनुमति है।

सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने प्रतिवाद किया कि अनुच्छेद 18(1) में “उपाधि” विशेष रूप से वंशानुगत या सम्मानसूचक उपसर्गों/प्रत्ययों (जैसे “सर” या “महाराजा”) को संदर्भित करता है, न कि योग्यता-आधारित राष्ट्रीय पुरस्कारों को। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय पुरस्कार न तो उपाधि हैं और न ही नाम के उपसर्ग/प्रत्यय के रूप में उपयोग किए जाते हैं, इसलिए वे अनुच्छेद 18 के निषेध के दायरे से बाहर हैं। सैन्य/शैक्षणिक विशिष्टताओं (उदा. “डॉ.” या “परमवीर चक्र”) के लिए छूट अस्पष्टता को रोकने के लिए शामिल की गई थी, क्योंकि इनमें स्वाभाविक रूप से उपसर्ग शामिल होते हैं लेकिन ये कार्यात्मक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। उन्होंने जोर दिया कि वैश्विक प्रथाएँ, लोकतांत्रिक देशों सहित, असाधारण सेवा को पुरस्कारों के माध्यम से राज्य द्वारा मान्यता देने का समर्थन करती हैं, जो समानता को नष्ट नहीं करतीं क्योंकि उनमें वंशानुगत दर्जा या प्रवर्तनीय विशेषाधिकार नहीं होते।

*न्यायालय का विश्लेषण*

न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि भारत रत्न जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18(1) के तहत “उपाधि” की श्रेणी में नहीं आते। इसका अर्थ है कि पुरस्कार प्राप्तकर्ता इन पुरस्कारों को अपने नाम के उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में उपयोग नहीं कर सकते (उदा. “भारत रत्न डॉ. X”)। यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करता है, तो संबंधित दिशा-निर्देशों के विनियम 10 में उल्लिखित औपचारिक प्रक्रिया के माध्यम से पुरस्कार वापस लिए जाने का जोखिम रहता है।

न्यायालय ने नागरिकों के असाधारण योगदान को सम्मानित करने के लिए ऐसे पुरस्कारों के महत्व पर जोर दिया, लेकिन वर्तमान चयन प्रक्रिया पर चिंता जताई। उसने गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को अत्यधिक व्यापक, अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताते हुए आलोचना की, जिसमें स्पष्ट मानदंडों जैसे पुरस्कारों की वार्षिक सीमा या श्रेणी-वार सीमा का अभाव है। जहाँ भारत रत्न कम संख्या में दिया गया है और उसकी प्रतिष्ठा बनी हुई है, वहीं अन्य पुरस्कार असंगत मानकों से ग्रस्त हैं।

इन सम्मानों की गरिमा बनाए रखने के लिए, न्यायालय ने चयन प्रक्रिया की समीक्षा और उसे सख्त बनाने हेतु एक उच्च-स्तरीय समिति (जिसे प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति के परामर्श से नियुक्त किया जाएगा) गठित करने की सिफारिश की। यह समिति सुनिश्चित करेगी कि पुरस्कार विवेकपूर्ण ढंग से दिए जाएं, जिससे जनता में संदेह के बजाय सम्मान बढ़े, और उन्हें बिना सार्थक जाँच के वार्षिक अनुष्ठान बनाने से बचा जाए।

*बिलासपुर में ‘पद्म’ सम्मानों के साथ लगे बोर्ड पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले से मुख्य सचिव को पत्र*

सार्वजनिक स्थलों पर भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म श्री जैसे नागरिक सम्मानों को नाम के साथ उपाधि के तौर पर लिखे जाने का मामला एक बार फिर सामने आया है। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे ने मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन को पत्र लिखकर नगर पालिक निगम बिलासपुर द्वारा सड़क-चौक पर लगाए गए ऐसे बोर्ड और शिलालेख हटाने की मांग की है।

पत्र में कहा गया है कि यह कृत्य माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा _Balaji Raghavan vs. Union of India, (1996) 1 SCC 361_ में दिए गए निर्णय के विपरीत है।

*क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?*

1995 में आए इस ऐतिहासिक फैसले में पाँच जजों की बेंच ने स्पष्ट किया था कि संविधान का *अनुच्छेद 18(1)* देश में सभी उपाधियों को समाप्त करता है। कोर्ट ने माना कि भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार *‘उपाधि’ नहीं, बल्कि ‘नागरिक सम्मान’* हैं।

फैसले के अनुसार, इन सम्मानों को नाम के पहले या बाद में उपसर्ग/प्रत्यय के रूप में इस्तेमाल करना अनुच्छेद 18(1) का उल्लंघन है। यदि कोई अलंकृत व्यक्ति ऐसा करता है तो राष्ट्रपति द्वारा दिया गया सम्मान वापस भी लिया जा सकता है।

*बिलासपुर का मामला*

रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे ने बताया कि नगर पालिक निगम बिलासपुर ने शहर के कई चौक-सड़कों पर ऐसे बोर्ड और शिलालेख लगा दिए हैं जिनमें व्यक्तियों के नाम के साथ ‘पद्म श्री’, ‘पद्म श्री ’ आदि को उपाधि की तरह दर्शाया गया है। पत्र के साथ साक्ष्य के तौर पर बोर्ड के फोटो भी संलग्न किए गए हैं।

राकेश चौबे ने इसे “न्यायालय की अवमानना” बताते हुए मुख्य सचिव से मांग की है कि:

1. *तत्काल कार्रवाई:* अनुच्छेद 18(1) के विपरीत लगे सभी बोर्ड/शिलालेख हटाने के लिए नगर निगम आयुक्त बिलासपुर को निर्देश जारी किए जाएं।

2. *नीतिगत निर्देश:* भविष्य में राज्य के सभी शासकीय-अर्द्धशासकीय निकायों के लिए नागरिक सम्मानों के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हों, ताकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पालन हो सके।

*कानूनी स्थिति क्या है?*

संविधान का अनुच्छेद 18(1) कहता है – “राज्य, सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय, कोई भी उपाधि प्रदान नहीं करेगा।” 1954 में भारत रत्न और पद्म पुरस्कार शुरू होने के बाद इन्हें लेकर विवाद हुआ था। 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर तय किया कि ये पुरस्कार ‘उपाधि’ नहीं हैं, इसलिए वैध हैं। लेकिन शर्त यह रखी कि इन्हें नाम के साथ ‘डॉ.’, ‘प्रो.’ की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

गृह मंत्रालय भी समय-समय पर एडवाइजरी जारी कर चुका है कि अलंकृत व्यक्ति अपने विजिटिंग कार्ड, लेटरहेड, निमंत्रण पत्र, पुस्तकों आदि पर ‘पद्म श्री’ को नाम के साथ न जोड़ें। केवल बायोडाटा या जीवन-परिचय में उल्लेख किया जा सकता है।

*आगे क्या?*

मुख्य सचिव कार्यालय ने पत्र मिलने की पुष्टि नहीं की है। नियमानुसार शासन 15 दिन में मामले का संज्ञान लेकर संबंधित विभाग से रिपोर्ट मांग सकता है। यदि बोर्ड नहीं हटाए गए तो याचिकाकर्ता के पास हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने का विकल्प खुला है।

नगर निगम बिलासपुर के अधिकारियों से संपर्क का प्रयास किया गया, पर खबर लिखे जाने तक उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है।

*पृष्ठभूमि:*  छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में सड़कों, चौक-चौराहों, भवनों के नामकरण और शिलालेखों में ‘भारत रत्न’, ‘पद्म’ सम्मानों का इस्तेमाल आम है। 2018 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी एक मामले में ऐसे बोर्ड हटाने के निर्देश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला 30 साल पुराना होने के बावजूद जमीनी स्तर पर जागरूकता की कमी दिखती है।

निर्मल माणिक/ प्रधान संपादक मोबाइल:- / अशरफी लाल सोनी 9827167176

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