“अपन हक बर लड़े ल परही सुतनिदहा मन जागा” जैसे पंक्ति लिखने वाले छत्तीसगढ़ के महान भाषाविद कलमकार डॉ. पालेश्वर शर्मा का जन्म दिवस एक मई पर विशेष लेख पढ़िए विजय मिश्रा “अमित”की कलम से आज

 

                         एक मई जन्म दिवस विशेष –

 

*छत्तीसगढ़ के महान भाषाविद कलमकार डॉ. पालेश्वर शर्मा*

इत्र हर जगह महकती है। उसी तरह शख्सियत की खुशबू को महकने से रोका नहीं जा सकता। इत्र और शख्सियत के ऐसे गुण डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा जी की जिन्दगी को परिभाषित करने की दृष्टि से सटीक बैठते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखित उनकी कहानियां कविताएं, निबंध, आदि रचनाएं आज भी रहीम,कबीर,तुलसी, मुंशी प्रेमचंद, रविंद्र नाथ टैगोर,हजारी प्रसाद की रचनाओं की तरह छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत में महक दमक रही हैं।

छत्तीसगढ़ी भाषा को सशक्त बनाने के लिए आजीवन उनकी कलम चली। “अपन हक बर लड़े ल परही सुतनिदहा मन जागा” जैसी पंक्तियों को लिखकर पालेश्वर बाबूजी ने हरेक छत्तीसगढ़िया के भीतर स्वाभिमान जगाने का प्रबल प्रयास किया।

छत्तीसगढ़ी भाषा में गीत,गजल, कविता अर्थात पद्य में रचनाएं ज्यादातर लिखी जा रही है किंतु गद्य में कहानी, नाटक, उपन्यास, व्यंग, संस्मरण, निबंध के लिखने का काम कम हो रहा है। छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत के इस असंतुलन को दूर करने के लिए उनकी कलम ने कमाल का धमाल किया। विद्वज्जन आज भी इसीलिए पालेश्वर जी को जीते जागते ‘आखर कोठी,पोथी पुरान’ अर्थात शब्द भंडार डिक्शनरी कहते हैं। उनका ‘आर्मी मेन’ सा अंदाज, अवाज, अनुशासन को देख सुनकर “एक इन्सान अनेक गुणों का खान” का भान वे कराते थे।

*धर्म नहीं कर्म बनाता है महान*

पालेश्वर जी की चर्चा के दौरान यही बात आती है कि मनुष्य का धर्म नहीं उसका कर्म ही उसे महान -अजर- अमर बनाता है’। डॉ. पालेश्वर का नाम छत्तीसगढ़ महतारी के ऐसे ही दमदार कलमकारों में शामिल है जिन्होंने छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत में खास लेखन का गुर नयी पीढ़ी के कलमकारों को सिखाया है।

छत्तीसगढ़ को बने छब्बीस वर्ष हो गए पर आज भी छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर धरातल पर ठोस कार्य का बोध नहीं हो रहा है। जबकि पालेश्वर जी अंग्रेजी और हिंदी सहित दीगर भाषाओं के जानकार होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी भाषा को पुख्ता बनाने के लिए अड़े खड़े और लड़ते हुए संदेशा दे गए- कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए। साधन सभी जुट जाएंगे बस संकल्प का धन चाहिए।

*पसीना में भीगने वाले रचते हैं इतिहास*

छत्तीसगढ़ में कहावत प्रचलित है “खेती अपन सेथी, गाय ना गरु सूत जा हरू” अर्थात खेती किसानी का काम स्वयं के दम पर ही कामयाबी देगी। गाय पालने का काम जिम्मेदारी भरा काम है। ऐसी खेती किसानी की बात को पालेश्वर जी ने अपने शोध प्रबंध ‘छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन’ में बखूबी उकेरा है। कृषक जीवन की दशा- दिशा संघर्ष को लेकर पालेश्वर जी ने जीवंत चित्रण किया है। उसे पढ़ते समय याद आती हैं अज्ञात कवि श्री की पंक्तियां-

*जो बारिश में भीगते हैं वे लिबास बदलते हैं,जो पसीने में भीगते हैं वे इतिहास बदलते हैं*।

पालेश्वर जी उंचे पूरे कद काठी के भी धनी थे। इस खासियत के साथ ही उनकी विशेष दक्षता उंची (बांस) कूद, कबड्डी खेलने में जोरदार थी। कड़क अनुशासन, आचार- बिचार- नियमबद्ध दिनचर्या के पालन ने उन्हें जीवन भर हिट और फीट बनाए रखा ।

*छत्तीसगढ़ी भाषा के असल खेवनहार*

एक कवि सम्मेलन में शामिल होने के लिए रामेश्वर वैष्णव और मीर अली मीर जी के साथ जा रहा था तभी रास्ते में खेत में बड़े-बड़े चोंच वाले सफेद सफेद पक्षी दिखाई दिए उन पक्षियों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने पालेश्वर जी की बहुचर्चित किताब ‘सुसक झन कुररी !सुरता ले’ पर लम्बी चर्चा छेड़ दी। तब मैंने जाना कि प्रवासी पक्षियों को छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘कुररी’ कहते हैं ।

इसी तरह एक और खास बात का उल्लेख करना चाहूंगा ।नौकरी चाकरी के लिए आवेदन करते समय फार्म में मातृभाषा हिन्दी लिखता था ,किंतु दाऊ देशमुख जी ने बताया कि पालेश्वर शर्मा जी जैसे गुणीजनों का कहना था कि छत्तीसगढ़वासियों को अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी ही लिखना है। डॉ पालेश्वर जी “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” बनाने के लिए जिनगी भर जूझते रहे। छत्तीसगढ़ महतारी और उसकी वाणी के ऐसे खेवनहार अटूट पतवार छत्तीसगढ़ी साहित्य की नौका को कभी डूबने नहीं देंगे।

*दूध मिश्री में पगी खीर जैसा साहित्य*

डॉ पालेश्वर शर्मा की हरेक रचना दूध मिश्री में पगी खीर की तरह स्वाद देती है। तभी तो एक बार हाथ लगी उनकी किताब आखरी पन्ना के आते तक पाठक के हाथ से छूटती नहीं है।किताब में लिखी बात दिल दिमाग में अंकित रहती है। छत्तीसगढ को धान के कटोरा क्यों कहते हैं? धान की खेती, धान से चावल निकालने की प्रक्रिया,खेती किसानी के अवजार, इनसे जुड़ी पहेलियां, कहावतों का ज्ञान पालेश्वर जी की किताब ‘छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली’ में बेहद रोचकता के साथ मिलती है। इस ग्रंथ के ग्यारह अध्याय को लिखने में लगे लेखक के परिश्रम को सोचते हुए कहना होगा कि- *जिनकी हथेली पर लकीर नहीं छाले होंगे, वे ही महालेखक पालेश्वर होंगे*।

पालेश्वर जी का जीवन माटी की महिमा का ज्ञान कराते हुए माटी का ऋण चुकाना भी सिखाता है।जहां जन्मे,जहां का खाए पीए वहां का गुणगान करना ही ज़िन्दगी का सार है नहीं तो चौरासी लाख योनि में सबसे बढ़िया जनम मिला कहना बेकार है। ऐसे महान माटी पुत्र

2 जनवरी 2016 को सदा के लिए मिटी में विलीन हो गए थे। जिंदगी के अंतिम पल तक कलम और भाषा की मान मर्यादा के लिए जूझते कलमकार की पुकार- अगर छीन लेंगे कलम को कलमकार से, तो ओ लिखे देखा कविता तलवार से।

*विजय मिश्रा ‘अमित’*

अग्रोहा कालोनी रायपुर (छग)492013

मो.9893123310

निर्मल माणिक/ प्रधान संपादक मोबाइल:- / अशरफी लाल सोनी 9827167176

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