
“कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते, वे जिए जाते हैं”—श्रुति प्रभला
बिलासपुर। वक़्त गुज़र जाता है, चेहरे बदल जाते हैं और ज़िंदगी हमें न जाने कितने रास्तों से गुज़ार लेती है, लेकिन कुछ गीत ऐसे होते हैं, जो हमें कभी अपने अतीत से अलग नहीं होने देते। कोई धुन बचपन की गलियों में ले जाती है, कोई नग़मा पहली मोहब्बत का एहसास जगा देता है, तो कोई गीत किसी बिछड़े हुए अपने की यादों को इस तरह ताज़ा कर देता है, मानो गुज़रा हुआ कल फिर से लौट आया हो। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर के ऐसे ही सदाबहार गीतों, भूली-बिसरी धुनों और दिल में उतर जाने वाले नग़मों के साथ बिलासपुर की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका श्रुति प्रभला एक विशेष सांगीतिक संध्या “नॉस्टेल्जिया” NOSTALGIA लेकर आ रही हैं।
शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को शाम 6:30 बजे बिलासपुर के लखीराम सभागार/ ऑडिटोरियम में आयोजित यह कार्यक्रम श्रोताओं को हिंदी फिल्म संगीत के उस सुनहरे दौर की सैर कराएगा, जिसके गीत आज भी पीढ़ियों को जोड़ते हैं। खास बात यह है कि कार्यक्रम में प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क रहेगा।
पुराने गीतों के बहाने यादों की दुनिया में लौटने का अवसर…
“नॉस्टेल्जिया” केवल पुराने फिल्मी गीतों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि उन भावनाओं को फिर से महसूस करने का अवसर है, जो इन गीतों के साथ हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बनीं। मोहब्बत की नज़ाकत, जुदाई की कसक, रिश्तों की गर्माहट और बीते हुए लम्हों की मिठास—हिंदी सिनेमा के कालजयी गीतों में जीवन के कितने ही रंग समाए हुए हैं।
कल्पना कीजिए, एक दिलकश शाम की ख़ामोशी में “लग जा गले” की भावपूर्ण धुन गूंजे, “अभी न जाओ छोड़कर” की मोहक पुकार दिल को छू जाए, “दिल ढूंढता है” मन को गुज़रे हुए दिनों की ओर ले जाए और “इक प्यार का नग़मा है” जीवन की खूबसूरती का एहसास करा दे और “रहे ना रहे हम,महका करेंगे” जैसे सदाबहार नग़मों का सांगीतिक सफ़र जारी हो तो कोई भी बे-साख्ता बोल पड़ेगा- “हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे” .
इन गीतों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि हर श्रोता इनमें अपनी कहानी तलाश सकता है। किसी के लिए ये जवानी के दिनों की याद हैं, किसी के लिए प्रेम की पहली अनुभूति और किसी के लिए जीवन के उन अनमोल क्षणों की निशानी, जिन्हें दोबारा जीने की इच्छा हमेशा बनी रहती है।
श्रुति की आवाज़ में सदाबहार संगीत की रवायत…
शास्त्रीय संगीत की गंभीर साधना और भावपूर्ण गायकी के लिए पहचानी जाने वाली श्रुति प्रभला भजन और ग़ज़ल गायन में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। उनकी गायकी की विशेषता सुरों की शुद्धता, भावों की गहराई और रचना के मर्म तक पहुंचने की संवेदनशीलता है। “नॉस्टेल्जिया” में वे इसी सांगीतिक समझ के साथ हिंदी फिल्म संगीत के सदाबहार नग़मों को प्रस्तुत करेंगी।
पुराने फिल्मी गीतों की खूबसूरती केवल उनकी मधुर धुनों में नहीं, बल्कि उनकी साहित्यिक संरचना, संगीत-संयोजन और भावाभिव्यक्ति में भी निहित है। इन गीतों में प्रेम है, प्रतीक्षा है, मिलन है, बिछोह है और जीवन की अनिश्चितताओं के बीच खूबसूरत पलों को संजो लेने का संदेश भी। श्रुति की यह प्रस्तुति, इन रचनाओं की भावनात्मक गहराई और कालजयी आकर्षण को श्रोताओं तक पहुंचाने की ईमानदार कोशिश होगी।
“नॉस्टेल्जिया” कि इस खूबसूरत शाम को भोपाल से आये अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वायलिन वादक मनोज कुमार, तबले पर जनाब शाहनवाज़ हुसैन, सिंथेसाइजर पर जनाब शाहिद मासूम एवं आक्टोपैड पर बिलासपुर के पीटर मुदलियार की संगत और भी सुरमई बना देगी .
शास्त्रीय साधना से अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहचान…
बिलासपुर की बेटी श्रुति प्रभला ने अपनी संगीत-साधना और प्रतिभा से अपने प्रदेश सहित शहर को भी गौरवान्वित किया है। वे संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता के गुरु तथा आगरा संगीत घराने के उस्ताद वसीम अहमद खान की शिष्या हैं। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से मास्टर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स की उपाधि प्राप्त की है।
श्रुति अंतरराष्ट्रीय गायन प्रतियोगिता “द वॉयस ऑफ वर्ल्ड” की विजेता रही हैं। इस्कॉन नेल्लोर द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय भजन प्रतियोगिता में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त कर स्वर्ण पदक हासिल किया। कबीर गायन के लिए स्वर्गीय माधवराव सप्रे स्मृति महोत्सव में मुख्यमंत्री सम्मान तथा नव्या सम्मान से भी उन्हें विभूषित किया गया है।
छत्तीसगढ़ राज्योत्सव सहित अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर शास्त्रीय गायन प्रस्तुत कर चुकीं श्रुति ने भजन, कबीर गायन और ग़ज़ल के क्षेत्र में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उन्होंने एनटीपीसी, सीपत का आधिकारिक गीत गाया है और ऑल इंडिया रेडियो के लिए ग़ज़ल गायन की विशेष प्रस्तुति भी दी है।
शास्त्रीय संगीत की अनुशासित साधना, भजनों की आध्यात्मिकता और ग़ज़लों की भावप्रवणता से समृद्ध उनकी सांगीतिक यात्रा अब हिंदी सिनेमा के अमर गीतों के माध्यम से श्रोताओं को एक अलग ही अनुभव देने जा रही है।
श्रुति बोलीं : “कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते, वे जिए जाते हैं”…
पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के प्रति अपने लगाव और “नॉस्टेल्जिया” की संकल्पना के बारे में श्रुति प्रभला कहती हैं, “कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। उनकी कोई धुन हमें अपने बचपन में ले जाती है, कोई गीत किसी भूले-बिसरे रिश्ते की याद दिलाता है, तो कोई हमें ज़िंदगी के ऐसे खूबसूरत लम्हों से फिर मिला देता है, जिन्हें हमने समय के साथ कहीं पीछे छोड़ दिया था। मेरे लिए “नॉस्टेल्जिया” केवल पुराने गीतों को गाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन भावनाओं को फिर से महसूस करने की एक कोशिश है, जो इन गीतों को सुनते हुए हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं।”
श्रुति आगे कहती हैं, “अच्छे गीत कभी पुराने नहीं होते। समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन सच्चे संगीत का जादू हमेशा बरकरार रहता है। मेरी कोशिश होगी कि इस शाम जब कोई श्रोता सभागार से बाहर निकले, तो उसके साथ केवल गीतों की धुनें ही नहीं, बल्कि कुछ खूबसूरत यादें, कुछ अनकहे एहसास और चेहरे पर एक मीठी-सी मुस्कान भी हो।”
वे मानती हैं कि संगीत लोगों को जोड़ने की अद्भुत क्षमता रखता है। पुराने गीतों को सुनते हुए अलग-अलग पीढ़ियों के लोग एक ही भावभूमि पर आ जाते हैं। यही कारण है कि इन गीतों का आकर्षण दशकों बाद भी कम नहीं हुआ है।
आइए, यादों और संगीत के नाम करें एक शाम…
“नॉस्टेल्जिया” उन लोगों के लिए विशेष अवसर होगा, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर को जिया है, और उन युवाओं के लिए भी, जो उस संगीत विरासत को करीब से महसूस करना चाहते हैं। यह शाम उन गीतों के नाम होगी, जिन्होंने कभी किसी की मोहब्बत को आवाज़ दी, किसी के अकेलेपन को सहारा दिया और किसी के जीवन की अनमोल यादों को हमेशा के लिए संजो लिया।
आयोजक-द्वय,भारतीय शास्त्रीय कला-संगीत और संस्कृति को सहेजने वाली अग्रणी संस्था “बावरा मन” और “श्लोक-ध्वनि फाउंडेशन” ने श्रुति प्रभला के “नॉस्टेल्जिया” कार्यक्रम के लिए बिलासपुर के संगीतप्रेमियों, परिवारों, युवाओं और सदाबहार हिंदी फिल्मी गीतों के प्रशंसकों को इस समय-बद्ध सांगीतिक संध्या में शामिल होने का आत्मीय आमंत्रण दिया है। उनकी अपील है कि लोग अपने परिजनों और मित्रों के साथ आएं और उन गीतों के साथ कुछ खूबसूरत पल बिताएं, जो आज भी दिलों में गूंजते हैं।

