फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को खरीदने में हो रही अनावश्यक देरी पर हाई कोर्ट का सख्त रुख,राज्य के वित्त सचिव और गृह सचिव को शपथ पत्र जारी कर स्पष्टीकरण देने के निर्देश 

124 करोड रुपए से फायर ब्रिगेड गाड़ियां खरीदने की प्रक्रिया 6 महीने से चल रही है

अगली सुनवाई 31 अगस्त को

 

बिलासपुर । हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा प्रदेश भर में अग्नि दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए बेहतर उपाय हेतु चल रही जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आज सख्त रुख अपना लिया। गौरतलब है कि यह जनहित याचिका हाई कोर्ट के द्वारा स्वत संज्ञान लेकर चालू की गई है क्योंकि प्रदेश में अग्नि दुर्घटनाओं से निपटने के स्टेशन मशीन उपकरण एवं गाड़ियां तथा स्टाफ आदि भी पर्याप्त संख्या में नहीं होने के समाचार प्रकाशित हुए थे। इस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने लगातार यह भरोसा दिया की स्थिति को बेहतर करने के प्रयास किया जा रहे हैं और इसी सिलसिले में जून के महीने में हाई कोर्ट को यह बताया था कि 124 करोड रुपए की लागत से नए फायर ब्रिगेड गाड़ियों को खरीदने का टेंडर हो चुका है और वह जल्दी ही राज्य में उपलब्ध होगी।

आज की सुनवाई के ठीक पहले राज्य शासन ने जो शपथ पत्र दाखिल किया था उससे यह स्पष्ट हुआ कि उक्त 124 करोड रुपए के द्वारा गाड़ियों की जो खरीद होनी थी वह अभी भी अटकी हुई है क्योंकि इसमें समय अधिक लग जाने के कारण समय सीमा में वृद्धि और टेंडर में सबसे कम निविदा डालने वाले संस्था के साथ एग्रीमेंट अभी तक नहीं हुआहै। राज्य के पुलिस महानिदेशक ने गृह सचिव को पत्र लिखकर जून में ही इस समय सीमा को बढ़ाकर अनुमति देने की मांग की थी जो आज तक नहीं आई है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने कहा कि मामला अंतिम चरण में है और वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति शीघ्र मिलने की उम्मीद है। इस स्तर पर हाई कोर्ट द्वारा इस प्रकरण में नियुक्त न्याय मित्र अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने खंडपीठ को अवगत कराया कि मामला लंबे समय से अटका हुआ है और पिछले दो माह में पांच स्मरण पत्र जारी हो चुके हैं परंतु ना समय सीमा में वृद्धि हुई है ना अन्य तरीके का अप्रूवल। अधिवक्ता ने यह भी बताया कि स्मरण पत्रों में हाई कोर्ट के द्वारा प्रकरण की मॉनिटरिंग और किए गए आदेशों का जिक्र होने के बावजूद प्रशासनिक वित्तीय आदि अनुमतियां में विलंब होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

चीफ जस्टिस रमेश सिंह ने इस स्थिति पर संज्ञान लेते हुए टिप्पणी की कि अनुमतियां देने का काम तो बहुत जल्दी हो सकता है साथ ही खंडपीठ ने राज्य शासन से सवाल किया कि आखिर इन अनुमतियों में इतना विलंब क्यों हो रहा है जब पहले ही यह निर्णय हो चुका है और इसके आधार पर टेंडर भी हो चुके हैं तो फिर कार्यवाही लंबित क्यों है। खंडपीठ ने राज्य के वित्त सचिव और राज्य के गृह सचिव को संबंधित अनुमतियां और समय वृद्धि दिए जाने में विलंब क्यों हो रहा है इसे स्पष्ट करने के लिए शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को रखी गई है।

निर्मल माणिक/ प्रधान संपादक मोबाइल:- / अशरफी लाल सोनी 9827167176

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